बच्चों की बाल कहानी - प्यारे बच्चों "भाई या शत्रु" एक ऐसी जो आपको एक बहुत अच्छी सीख का उदाहरण देगी और आपका मनोरंजन भी करेगी। ये बच्चों की बाल कहानी दो भाइयों की है जो एक दूसरे को अपना दुश्मन मानते हैं। आइये साथ मिलकर पढ़ते हैं कि ये कहानी क्या कहती है।
बच्चों की बाल कहानी - भाई या शत्रु
एक गांव में एक परिवार रहता था जिसमे 2 छोटे बच्चे जिनका नाम सोहम और नमन था, अन्य सदस्य उनके माता-पिता और दादी-दादा थे। सोहम और नमन कभी इकट्ठे नहीं रहते थे क्योंकी उनकी कभी आपस में बनती नहीं थी ना कभी उनकी राय मिलती थी जिस कारण उनका झगड़ा हो जाता। कोई कहता आज हम इंडिया गेट घूमने जाएंगे तो कोई कहता लाल किला, कोई कहता की आज हम फुटबॉल खेलेंगे तो कोई क्रिकेट की कामना करता था। कम शब्दों में दोनो पूर्व और पश्चिम थे और एक दसरे की होड़ में एक दसरा को कम काबिल होने के लिए नीच दिखाने की कोशिश किया करते थे।
एक दिन सोहम ने अपने पिता से कहा - पिताजी आप हमारे लिए कितनी मेहनत करते हैं तो मैं आपकी थोड़ी मालिश कर देता हूं।
पिताजी मुस्कुराते हुए कहते हैं - "नहीं..बेटा मैं बिलकुल ठीक हूँ, मुझे इसकी ज़रुरत नहीं"
सोहम कहता है - "पर पिताजी मुझे पता है आप थक गए होंगे"
तभी नमन हस्तक्षेप करते हुए - "पीताजी किसी से नहीं केवल मेरी मालिश से खुश होंगे क्योंकि मेरे हाथों में तो जादू है"
सोहम कहता है (गुस्से में) - "नहीं मैं अच्छी मालिश कर सकता हूं पिताजी की, मेरे हाथों में असली जादू है.."
यहां फिर एक बार इन दोनों में बहस छिड़ जाती है। पिताजी उन्हें शांत कराते हुए कहते हैं - "अच्छा..अच्छा..बच्चो शांत, तुम दोनो के हाथों में जादू है" इतना कहकर उनकी बात घुमाने के लिए वह बाहर से आइसक्रीम लाने के लिए कहते हैं और उनसे उनका मनपसंद फ्लेवर पूछते हैं।
जवाब देते हुए नमन वेनिला की और सोहम चॉकलेट फ्लेवर आइस-क्रीम की मांग करते हैं। यहां फिर से दोनो में बहस हो जाती है। तो माता और पिता फिर से दोनो को शांत करने के लिए हुए दोनों की पसंद की आइसक्रीम लाने की कह देते हैं। ऐसा पहली बार नहीं है, ये दोनों अक्सर ऐसी छोटी-छोटी बातें पर झगड़ा करते रहते थे।
दादाजी और दादीजी के पास वे अक्सर सोने से पहले कहानियां सुनने के लिए जाते और वे जैसे ही सुनने लगते वैसा ही उनका झगड़ा शुरू हो जाता और अधिकतर समय उन दोनो का झगड़ा सुलझाने में चला जाता था। आज भी ऐसा ही हुआ जब वे दादाजी से कहानी सुनने लगे तो फिर से उन में झगड़ा शुरू हो गया। एक कहता की आज परियों की कहानी सुननी है तो दसरे ने आज जंगल की कहानियों की फरमायिश रख दी। दादाजी ने शांत कराते हुए यह कहा कि "यदि शांत ना हुए तो मैं आज कोई कहानी नहीं हुए सुनाऊंगा" तभी सोहम और नमन दोनों एकदम शांत हो गए।
दोनो फुसफुसाने लगे - "पर दादाजी मैंने क्या किया इसने झगड़ा पहले शुरू किया।"
"एक काम करते हैं" दादाजी ने कहा, "आज दो-दो कहानियां सुन लेते हैं" दोनो ही खुश हो जाते हैं और एक-दसरे को पैनी नजरों से देखने लगते हैं। अब दादाजी परियों की कहानी सुनानी शुरू करने लगते हैं तो सोहम जिसने जानवरों की कहानी की मांग की थी,
ज़ोर से बोला - "पर दादाजी पहले मेरी कहानी सुनाइये ना"
"नहीं...आप यही वाकई कहानी सुनाइए" - जवाब में नमन ने कहा। अब दादाजी क्रोधित हुए बोल पड़े "आज कोई कहानी नहीं, जाओ और अपने-अपने बिस्तर पर सो जाओ!!" ऐसा कहने पर दोनों का चेहरा मुरझा-सा गया और वे अपने बिस्तरों की ओर चलने लगे। दादाजी ने उनको ऐसा देख उनको रोक लिया और कहा "रुको, मैं कहानी सुना देता हूं पर इन दोनो कहानियों को छोडकर कोई और कहानी सुनाऊंगा?" दोनो भाई खुश होकर शांति से कहानी सुनने बैठे गए।
"परंतु मुझसे वादा करो की तुम पुन: झगड़ा नहीं करोगे?" ददजीने पूछा,
"हां हां, अब नहीं करेंगे पक्का" दोनो बच्चे बोले।
इतना कहने पर दादाजी ने उन्हें कहानी सुना दी।
असल में वे दोनो घर में सबसे ज़्यादा लाडले अपने दादा जी के थे, दादाजी उनसे बहुत प्रेम करते थे। सोहम और नमन भी सबसे ज्यादा अपने दादाजी से ही प्रेम किया करते और घर में अधिकतर समय उनके साथ ही बिताते थे इसलिये जब भी वे कुछ कहते थे सोहम और नमन दादाजी की एक कही में सुन लेते थे।
सोहम और नमन की ये हरकतें सब उनकी गलतीयों को बचपना समझकर नजरंदाज करते थे। वे जब भी लड़ाई करते तो बड़े ही प्यार से उन्हें समझकर चुप करा दिया जाता है। कुछ समय तक ऐसा ही चलता रहा। परंतु सब उनकी प्रतिदिन के झगड़ो को देख अब नादानी को समस्या समझने लगे। घर के बड़े जब भी कोई कार्य करते थे तब-तब उनकी झगड़ने की आवाज शुरू हो जाती थी। उन सब का सोहम-नमन को एक जगह अकेले छोडना एक पाप सा हो गया था इसलिये सब उनके ऐसा करना के लिए उनके भविष्य की चिंता करने लगे। वे ऐसे ही रहेंगे तो उनकी प्रकृति भी आक्रामक हो जाएगी और न ही वे मिल-जुलकर रह पाएंगे। ऐसे में उन्हें शीशा दिखाना जरूरी पड़ गया था।
घर के सब बड़े अब उन्हें बात-बात पर टोकने लगे, समझाने लगे। अब उनके हर बार झगड़ने पर उनको डाँट भी पढ़ने लगी फिर भी उन्हें इस चीज का ज्यादा फर्क नहीं पड़ा क्योंकी उनकी एक-दसरे से लड़ना एक आदत-सी हो गई थी। दूसरी ओर हर बार डांट खाने पर वे हताश होने लगे थे। इस कारण अब उन्होंने झगड़ना कई हद तक कम तो अवश्य कर ही दिया था परंतु जब भी वे लड़ते थे अपना सारा रुका हुआ क्रोध तभी और तेजी से निकाल देते थे। घर का सबसे बड़ा सदस्य होने के नाते दादाजी ने सभी बड़ों को समझाया कि बच्चों को डांटना और बात-बात पर नुख्स निकालना सही नहीं है। इससे वे और ज्यादा परशानी में आएंगे।
"फिर इसके अलावा हम क्या करें" पिताजी और माताजी ने पूछा, "वे अब लाड प्यार में इतने ज़िद्दी हो गए हैं कि किसी बड़े की भी बात अब एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल रहे हैं"।
"हां पर जैसा हम कर रहे हैं वह भी उचित नहीं है", दादाजी ने कहा, तभी दादाजी के दिमाग में एक तरकीब सूझी और सभी से साझा करते की जिसके लिए सब मान जाते हैं।
अगले दिन, सोहम और नमन अपने विद्यालय से आते हैं। वह घर पहुंचते हैं तो पाते हैं कि दादाजी के अलावा घर में कोई नहीं है, पिताजी अपने काम पर गए हैं, माता बाजार से सब्ज़ियां लेने गई हैं और दादी मंदिर। दोनो बच्चों को विद्यालय से आए काफ़ी समय हो जाता है इसलिये उनको जोरो से भूक लगने लगती है। वे थोड़ा और रुकने के बाद दादाजी से अपने भूके लगने की बात जताते हैं तभी दादाजी उनके खुद के भी भूखा होने की खबर देते हैं। दोनो बच्चे निराश होकर दादाजी को बिना बताए चुपके रसोई में खुद कुछ न कुछ खाने का सामान ढूंढने लगते हैं। "बच्चों मैं बाहर कुछ ज़रुरी कार्य से जा रहा हूं, लोटते वक्त तुम्हारे लिए कुछ खाने के लिए भी ले आउंगा" दादाजी बोले। परंतु उन दोनों भूखे शैतानों को कहां रुकना था, वे दादाजी के बाद जाने के बाद फिर चालू हो गए।
खाने का सामान ढूंढते-ढूंढते अब उन दोनों में एक बार फिर लड़ाई शुरू हो गई। वे कई देर तक लड़ते रहे परंतु जब उनहें कोई चुप नहीं करा सकता था तो वे खुद ही एक-दसरे की बात को सुनकर शांत हो गए। उसी समय दादाजी घर में दस्तक देते हुए घर में घुसे वे छाती पर जात रखे हुए थे, आंखें ये लाल-लाल मोटी-मोटी लिए, लंबी-लंबी सांसें भरते हुए और दोनो बच्चों का नाम बार-बार पुकार रहे थे। दोनों बच्चे बहुत ज्यादा घबड़ा गए और दादाजी से उनकी हालत पूछने लगे परंतु दादाजी जवाब देने के बिलकुल काबिल नहीं थे।
"अब क्या होगा, घर में भी कोई मौजूद भी नहीं है जो दादाजी की मदद कर सके, नमन फुसफुसाया, भगवान जी मेरे दादाजी को ठीक कर दो", नमन और सोहम ने भगवान जी से निवेदन किया।
दादाजी से ठीक से बोला भी नहीं जा रहा था और केवल मुंह से हवा ही बाहर आ रही थी। मुश्किल से कुछ एक-आधा शब्द सही सुनाई पड़ रहा था। सोहम और नमन दादाजी को देखकर रोने लगे, तभी दादाजी अलमारी के ऊपर की इशारा करते हुए, कुछ कहने की कोशिश करने लगे। ऐसा करते देख पहले दोनों सोचने लगे कि दादाजी ऐसा क्यों कर रहे हैं परंतु कुछ ही पलों में उन्हे समझ आ गया कि अवश्य ही वहां दादाजी की दवा होगी। "तभी दादाजी वह बार-बार इशारा कर रहे हैं.." नमन ने कहा।
"हां सही कह रहे हो परंतु इतनी ऊपर से उठाएगा कौन?" सोहम ने सवाल किया। असल में अलमारी उनसे दोगुनी बड़ी थी। पहले तो वे विचार करते रहे परंतु दादाजी की हालत ज्यादा बिगड़ने पर उन्होंने समय खराब न करते हुए खुद कोशीश करने का फैसला किया।
दादाजी ज़ोर-जोर से आँहें भरते हुए और वहाँ अब पूर्ण रूप से शांति से वे दोनों साझेदारी के साथ कभी वे एक दूसरे के कंधों पर चढ़ते तो कभी कुर्सियों का प्रयोग करने लगे। कैसे न कैसे करके उस दवाई के डिब्बे को फटाफट ददाहि को लाकर्स सौंप दिया। नमन भागकर पानी भी ले आया दादाजी की मदद करते हुए उन दोनो ने झट से दादाजी को दवा खिला दी। फिर भी आराम न पड़ने पर वे अब रोते-रोते सोच में पड़ गए और इसका उपाय सोचने लगे। तत्काल उनके दिमाग में पास के डॉक्टर अंकल का ख्याल आया।
"पर यहां दादाजी के लिए भी हम में से किसी एक को रुकना पड़ेगा.." सोहम ने कहा। नमन ने जवाब दिया "एक काम करते हैं तुम डॉक्टर अंकल को लेकर जल्दी से जल्दी आने की कोशिश करो और यहां मैं संभालता हूं"। "ठीक है" - सोहम, "ऐसा ही करते हैं तुम बस दादाजी का सही से ख्याल रखना" ऐसा कहते हुए सोहम झटपट से डॉक्टर अंकल की ओर भागा। वहाँ नमन दादाजी को बहुत परेशान देखकर रोने लगा कभी उनके हाथ-पैरों को मसलता तो कभी उनसे जाने के लिए कहता, कभी उनको पानी पिलाता तो कभी उनकी आंखों पर छीटें मारता।
सोहम कुछ ही देर में डॉक्टर अंकल को जैसे-तैसे सारी बात बताकर कर जल्दी से ले आता है। डॉक्टर अंकल भी जल्दी से दादाजी का उपचार शुरू कर देते हैं। सब कुछ जाँचने के बाद वह सारा खेल समझ जाते हैं और दादाजी भी झट से उठकर ऐसे बैठे जाते हैं जैसे कुछ हुआ ही ना हो। दोनो ही बच्चे उन्हे ऐसा देखकर चौंक जाते हैं। वे दोंनो डॉक्टर अंकल से पूछने लगते हैं - "दादाजी ठीक हो गए क्या?"। डॉक्टर अंकल - "अरे..बेटा उनको कुछ होगा तभी तो वो ठीक होंगे न, वो बिलकुल ठीक हैं और उन्हें कुछ-भी नहीं हुआ था" ऐसा कहकर दादाजी के साथ ज़ोर-से हंसने लगते हैं।
दोनो बच्चे साथ मिलकर दादाजी से खूब शिकायत करते हैं और खूब रूठते हैं। इतनी देर में दादीजी और माताजी घर लौट आती हैं और वो दोनो भी इनके साथ मिलकर हंसने लगती हैं। बच्चे सबको हंसता देख हैरान हो जाते हैं कि ये सबको हो क्या गया है? सोहम और नमन उनसे बार-बार हँसने का कारण उनसे पूछते हैं। बड़ी मुश्किल से हँसी को रोकते हुए, चैन से बैठकर दादाजी सोहम और नमन को सारी बातें स्पष्ट करते हैं। "बेटा ये सब हमारी योजना के अनुसार बनाया एक नाटक था" दादीजी ने बताया।
"ये नाटक...., ऐसा नाटक....., इसका क्या मतलब है" नमन ने क्रोधित होकर पूछा। "तुम दोनो के झगड़ों को हमेशा के लिए अलविदा कहने का नाटक", माताजी ने हंसते हुए बोला। "क्या बोल रहे हो माताजी इसका हमारे झगड़ों से क्या मतलब", सोहम ने पुछा। "सब एक बार रुको, मैं यही बताता हूं", दादाजी ने कहा। आधे में काटते हुए नमन ने गुस्से से कहा "दादाजी आप कृप्या हम से मत बोलिए, ऐसे नाटक में आप भी इनके साथ हो गए"। "बेटा नमन, ऐसा करना आप दोनों ने ही तो हमारे लिए ज़रुरी बना दिया था" दादाजी ने जवाब दिया, "हमने बनाया ... हमने कब?" सोहम पूछता है। "थोड़ा आप दोनो शांति के साथ सोचो आप दोनों कैसी छोटी-छोटी बातों पर लड़ते थे, एक-दसरे से चिढ़ने लगे थे, तुम दोनो की हरकतों ने तुम्हारे दिमाग को ही इतना वश में कर लिया कि तुम बड़ों का कहा भी नहीं सुनते थे, तुम सारी तमीज़ तक खोने लगे और एक-दसरे को शायद भाई ही मानना छोडकर केवल एक-दूसरे को अपना प्रतिस्पर्धी समझने लगे, क्यों, मैं सही कह रहा हूं ना सोहम नमन?"
दोनो बच्चों को समझ आ जाता है कि वे कितनी बड़ी गलती कर रहे थे।
"ये सब भी इसी नाटक को निभा रहे थे जिसके लिए इन्होंने मुझे चुना ताकि मेरे कारण तुम पर अधिक प्रभाव पड़े जबकि बाकी सभी को बाहर ही रहना था ताकि हम तीनों के बीच कोई ना आ सके और तुम किसी पर निर्भर न हो जाओ। हम सब घर पर नहीं थे ऐसा इसलिए ताकि तुम दोनों मिल-जुलकर कोई कार्य करो। तुम लड़े भी होंगे परंतु खुद बात हो हल करना सीखे भी होंगे। तुमने साथ में मिलकर दवा के लिए योजना बनायी, एक-दूसरे का कहा भी माना, बिना लड़े बिना एक दसरे की आलोचना करे" दादाजी ने सबकुछ स्पष्ट कर दिया।
"हाँजी दादाजी हम समझ गए आपने ये सब क्यों किया", सोहम ने कहा, "और हाँ, इस सब से हम दोनों ने साथ मिलकर कार्य करना सीखा"।
दादाजी ने बताया, "इसलिए हमने ऐसी योजना बनाई ताकि तुमको पता चल सके कि एकता में कितना बल है, किसी भी कार्य में एक से भले दो होते हैं"। दोनों की आँखों में आँसू झलकने लगे और अपने गलत करने पर सभी से माफ़ी मांगने लगे। साथ-ही-साथ एक-दूसरे से भी माफ़ मांगकर ज़ोर से गले मिल गए। पिताजी घर आकर सोहम और नमन को साथ मिलते देख बहुत प्रसन्न हुए और घर में एक छोटी सी दावत आयोजित की और फिर दोबारा कभी-भी इन दोनों में लड़ाई नहीं हुई।
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